वक़्त चलता है आपनी चाल से
लहरे झूमती हैं आपनी ताल पे
पर
दिल क्यूँ मचलता है
किसी की याद में
आखिर क्यूँ थिरकता है
उनकी ख्वाब में.
दिल के इस दर्द को कैसे बयां करूँ
दीप के किस प्रकाश मैं इसे रौशन करूँ
दिलों के मिलन जंग में
अंतरात्मा के दव्न्द में
मैं क्या करूँ
मैं क्या करूँ.
मैं कर्तव्य विमूढ़
न सूझ रहा कुछ
मांगता मदद तुझसे
मुझे प्रकाश दे
मुझे प्रकाश दे.
यह कविता २८ अप्रैल २००६ को लिखी गयी थी.
श्याम किशोर शर्मा.
Thursday, March 11, 2010
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